गुरुवार, 4 जनवरी 2018

मदर टेरेसा

मां मैं चाहती हूं
बनना मदर टेरेसा
 परन्तु  सोचती हूं यदि किसी
बीमार असहाय को
पिलाने जाऊं पानी
 पूछ बैठा समाज
कि उससे रिश्ता क्या है
तो कहो मां मैं क्या कहूंगी?? 
क्या सामाजिकता पर
इंसानियत की चोट करूंगी!!
माँ, कैसे बनी होगी
मदर टेरेसा सबकी मां
मेरे समाज में
ऐसे समाज में
जहां एक माँ से ही
लोग  उकता जाते हैं
मां के जाने पर
गंगा नहा आते हैं!!!
प्रीति राघव चौहान

बुधवार, 3 जनवरी 2018

यूँ ही कुछ

चाँद

उसे चांद से कम
कुछ नहीं चाहिए
उसे क्या मालूम
चांद पर चट्टानों के सिवा कुछ भी नहीं
उसे क्या मालूम चांद पर परिया नहीं है
नहीं मिलेगी वहां कोई बुढ़िया
जिसकी दूर उड़ती रुई को वह ला कर देगी
और बदले में उसे मिलेगा
लोहे का जादुई बक्सा
चांद पर पथरीली नुकीली
चट्टानों के सिवा कुछ भी नहीं
उसे क्या मालूम वहां वह
हर कदम पर नापेगी छःपग
ना चाहकर भी होगी छलनी
कदम-दर-कदम
उसे क्या मालूम ...
इस चांद ने हर कल्पना को निगला है
धरती की गोद में बैठे जो चांद
बर्फ़ की चुस्की सा नजर आता है
वो हकीकत  में पत्थर है
चांद तक जाने वाली सीढ़ियां
चमकीली सीढ़ियां
वापसी पर
मल्टीप्लैक्स थिएटर के एग्ज़िट जैसी
पीकदार भी नहीं होती ..
वह खो जाती है
चांद के पत्थरों में
कहां से लाऊं वो बरतन
वह पानी जिसमें दिखे उसे चाँद....
प्रीति राघव चौहान

सोमवार, 1 जनवरी 2018

माना के साल अभी नया नया सा है




माना कि साल अभी नया नया सा है
ये और बात कि चहूँओर बस धुँआ सा है

मेरा दर मेरी खिड़की बंद है बेज़ा नहीं
बाहर सर्द समन्दर का गहरा कुँआ सा है

भेज दी है दरख्वास्त आफताब को हमने 
पिघलना अभी कुछ शुरु वो हुआ सा है

बड़े शहर बड़ी सौर जश्न उससे भी बड़े
गाँव का बाशिंदा अब भी अनछुआ सा है

ज़िन्दगी क्या है झगड़ा दीवानी  सा है
तारीख़ पर तारीख़ हैं लगता सुना हुआ सा है 

ये बात और है कि पत्थर हो गया हूँ  मैं
देखकर के सुर्खियाँ खड़ा रुँआ रुँआ सा है
                           प्रीति राघव चौहान 






Khushiyon ki kunji

https://www.speakingtree.in/slideshow/खुशियों-की-कुंजी

जोर में बंधी आस्था

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